{"product_id":"2940046051698","title":"Aankh Ki Kirkiri (Hindi)","description":"\u003cp\u003eविनोद की माँ हरिमती महेंद्र की माँ राजलक्ष्मी के पास जा कर धरना देने लगी। दोनों एक ही गाँव की थीं, छुटपन में साथ खेली थीं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eराजलक्ष्मी महेंद्र के पीछे पड़ गईं - 'बेटा महेंद्र, इस गरीब की बिटिया का उद्धार करना पड़ेगा। सुना है, लड़की बड़ी सुंदर है, फिर पढ़ी-लिखी भी है। उसकी रुचियाँ भी तुम लोगों जैसी हैं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eमहेंद्र बोला - 'आजकल के तो सभी लड़के मुझ जैसे ही होते हैं।'\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eराजलक्ष्मी- 'तुझसे शादी की बात करना ही मुश्किल है।'\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eमहेंद्र - 'माँ, इसे छोड़ कर दुनिया में क्या और कोई बात नहीं है?'\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eमहेंद्र के पिता उसके बचपन में ही चल बसे थे। माँ से महेंद्र का बर्ताव साधारण लोगों जैसा न था। उम्र लगभग बाईस की हुई, एम.ए. पास करके डॉक्टरी पढ़ना शुरू किया है, मगर माँ से उसकी रोज-रोज की जिद का अंत नहीं। कंगारू के बच्चे की तरह माता के गर्भ से बाहर आ कर भी उसके बाहरी थैली में टँगे रहने की उसे आदत हो गई है। माँ के बिना आहार-विहार, आराम-विराम कुछ भी नहीं हो पाता।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eअबकी बार जब माँ विनोदिनी के लिए बुरी तरह उसके पीछे पड़ गई तो महेंद्र बोला, 'अच्छा, एक बार लड़की को देख लेने दो!'\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eलड़की देखने जाने का दिन आया तो कहा, 'देखने से क्या होगा? शादी तो मैं तुम्हारी खुशी के लिए कर रहा हूँ। फिर मेरे अच्छा-बुरा देखने का कोई अर्थ नहीं है।'\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eमहेंद्र के कहने में पर्याप्त गुस्सा था, मगर माँ ने सोचा, 'शुभ-दृष्टि'1 के समय जब मेरी पसंद और उसकी पसंद एक हो जाएगी, तो उसका स्वर भी नर्म हो जाएगा।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e1. बंगाल में विवाह के पहले लड़का-लड़की परस्पर एक-दूसरे को देखते हैं। यह रिवाज है। यही 'शुभ-दृष्टि' है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eराजलक्ष्मी ने बेफिक्र हो कर विवाह का दिन तय किया। दिन जितना ही करीब आने लगा, महेंद्र का मन उतना ही बेचैन हो उठा। मात्र दो-चार दिन पहले वह कह बैठा- 'नहीं माँ, यह मुझसे हर्गिज न होगा।'\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eछुटपन से महेंद्र को हर तरह का सहारा मिलता रहा है। इसलिए उसकी इच्छा सर्वोपरि है। दूसरे का दबाव उसे बर्दाश्त नहीं। अपनी स्वीकृति और दूसरों के आग्रह ने उसे बेबस कर दिया है, इसीलिए विवाह के प्रस्ताव के प्रति नाहक ही उसकी वितृष्णा बढ़ गई और विवाह का दिन नजदीक आ गया तो उसने एकबारगी 'नाही' कर दी।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eमहेंद्र का दिली दोस्त था बिहारी; वह महेंद्र को 'भैया' और उसकी माँ को 'माँ' कहा करता था। माँ उसे स्टीमर के पीछे जुड़ी डोंगी-जैसा भारवाही सामान मानती थीं और वैसी ही उस पर ममता भी रखती थीं। वे बिहारी से बोलीं - 'बेटे, यह तो अब तुम्हें ही करना है, नहीं तो उस बेचारी लड़की... '\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eबिहारी ने हाथ जोड़ कर कहा - 'माँ, यह मुझसे न होगा। अच्छी न लगी कह कर महेंद्र जो मिठाई छोड़ देता है वह मैंने बहुत खाई, मगर लड़की के बारे में ऐसा नहीं हो सकता।'\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eराजलक्ष्मी ने सोचा, 'भला बिहारी विवाह करेगा! उसे तो बस एक महेंद्र की पड़ी है, बहू लाने का खयाल भी नहीं आता उसके मन में।' यह सोच कर बिहारी के प्रति उनकी कृपा-मिश्रित ममता कुछ और बढ़ गई।\u003c\/p\u003e","brand":"Sai ePublications \u0026 Sai Shop","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47078374015216,"sku":"2940046051698","price":2.99,"currency_code":"USD","in_stock":true}],"url":"https:\/\/shop-qa.barnesandnoble.com\/products\/2940046051698","provider":"Barnes \u0026 Noble (DEV)","version":"1.0","type":"link"}