{"product_id":"2940046152951","title":"Mansarovar - Part 1 (Hindi)","description":"\u003cp\u003eमानसरोवर - भाग 1\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eअलग्योझा\u003cbr\u003eईदगाह\u003cbr\u003eमाँ\u003cbr\u003eबेटोंवाली विधवा\u003cbr\u003eबड़े भाई साहब\u003cbr\u003eशांति\u003cbr\u003eनशा\u003cbr\u003eस्‍वामिनी\u003cbr\u003eठाकुर का कुआँ\u003cbr\u003eघर जमाई\u003cbr\u003eपूस की रात\u003cbr\u003eझाँकी\u003cbr\u003eगुल्‍ली-डंडा\u003cbr\u003eज्योति\u003cbr\u003eदिल की रानी\u003cbr\u003eधिक्‍कार\u003cbr\u003eकायर\u003cbr\u003eशिकार\u003cbr\u003eसुभागी\u003cbr\u003eअनुभव\u003cbr\u003eलांछन\u003cbr\u003eआखिरी हीला\u003cbr\u003eतावान\u003cbr\u003eघासवाली\u003cbr\u003eगिला\u003cbr\u003eरसिक संपादक\u003cbr\u003eमनोवृत्ति\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e--------------------\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eभोला महतो ने पहली स्त्री के मर जाने बाद दूसरी सगाई की तो उसके लड़के रग्घू के लिये बुरे दिन आ गये। रग्घू की उम्र उस समय केवल दस वर्ष की थी। चैन से गाँव में गुल्ली-डंडा खेलता फिरता था। माँ के आते ही चक्की में जुतना पड़ा। पन्ना रुपवती स्त्री थी और रुप और गर्व में चोली-दामन का नाता है। वह अपने हाथों से कोई काम न करती। गोबर रग्घू निकालता, बैलों को सानी रग्घू देता। रग्घू ही जूठे बरतन माँजता। भोला की आँखें कुछ ऐसी फिरीं कि उसे अब रग्घू में सब बुराइयाँ-ही- बुराइयाँ नजर आतीं। पन्ना की बातों को वह प्राचीन मर्यादानुसार आँखें बंद करके मान लेता था। रग्घू की शिकायतों की जरा परवाह न करता। नतीजा यह हुआ कि रग्घू ने शिकायत करना ही छोड़ दिया। किसके सामने रोये? बाप ही नहीं, सारा गाँव उसका दुश्मन था। बड़ा जिद्दी लड़का है, पन्ना को तो कुछ समझता ही नहीं; बेचारी उसका दुलार करती है, खिलाती-पिलाती है यह उसी का फल है। दूसरी औरत होती, तो निबाह न होता। वह तो कहो, पन्ना इतनी सीधी-सादी है कि निबाह होता जाता है। सबल की शिकायतें सब सुनते हैं, निर्बल की फरियाद भी कोई नहीं सुनता! रग्घू का हृदय माँ की ओर से दिन-दिन फटता जाता था। यहाँ तक कि आठ साल गुजर गये और एक दिन भोला के नाम भी मृत्यु का संदेश आ पहुँचा।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eपन्ना के चार बच्चे थे- तीन बेटे और एक बेटी। इतना बड़ा खर्च और कमानेवाला कोई नहीं। रग्घू अब क्यों बात पूछने लगा? यह मानी हुई बात थी। अपनी स्त्री लाएगा और अलग रहेगा। स्त्री आकर और भी आग लगायेगी। पन्ना को चारों ओर अंधेरा- ही- अंधेरा दिखाई देता था। पर कुछ भी हो, वह रग्घू की आसरैत बनकर घर में न रहेगी। जिस घर में उसने राज किया, उसमें अब लौंडी न बनेगी। जिस लौंडे को अपना गुलाम समझा, उसका मुँह न ताकेगी। वह सुन्दर थी, अवस्था अभी कुछ ऐसी ज्यादा न थी। जवानी अपनी पूरी बहार पर थी। क्या वह कोई दूसरा घर नहीं कर सकती? यही न होगा, लोग हँसेंगे। बला से! उसकी बिरादरी में क्या ऐसा होता नहीं? ब्राह्मण, ठाकुर थोड़ी ही थी कि नाक कट जायगी। यह तो उन्ही ऊँची जातों में होता है कि घर में चाहे जो कुछ करो, बाहर परदा ढका रहे। वह तो संसार को दिखाकर दूसरा घर कर सकती है, फिर वह रग्घू की दबैल बनकर क्यों रहे?\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eभोला को मरे एक महीना गुजर चुका था। संध्या हो गयी थी। पन्ना इसी चिन्ता में पड़ी हुई थी कि सहसा उसे ख्याल आया, लड़के घर में नहीं हैं। यह बैलों के लौटने की बेला है, कहीं कोई लड़का उनके नीचे न आ जाय। अब द्वा र पर कौन है, जो उनकी देखभाल करेगा? रग्घू को मेरे लड़के फूटीआँखों नहीं भाते। कभी हँसकर नहीं बोलता। घर से बाहर निकली, तो देखा, रग्घू सामने झोपड़े में बैठा ऊख की गँडेरिया बना रहा है, लड़के उसे घेरे खड़े हैं और छोटी लड़की उसकी गर्दन में हाथ डाले उसकी पीठ पर सवार होने की चेष्टा कर रही है। पन्ना को अपनी आँखों पर विश्वास न आया। आज तो यह नयी बात है। शायद दुनिया को दिखाता है कि मैं अपने भाइयों को कितना चाहता हूँ और मन में छुरी रखी हुई है। घात मिले तो जान ही ले ले! काला साँप है, काला साँप! कठोर स्वर में बोली-तुम सबके सब वहाँ क्या करते हो? घर में आओ, साँझ की बेला है, गोरु आते होंगे।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eरग्घू ने विनीत नेत्रों से देखकर कहा— मैं तो हूँ ही काकी, डर किस बात का है?\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eबड़ा लड़का केदार बोला- काकी, रग्घू दादा ने हमारे लिए दो गाड़ियाँ बना दी हैं। यह देख, एक पर हम और खुन्नू बैठेंगे, दूसरी पर लछमन और झुनिया। दादा दोनों गाड़ियाँ खींचेंगे।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eयह कहकर वह एक कोने से दो छोटी-छोटी गाड़ियाँ निकाल लाया। चार-चार पहि्ये लगे थे। बैठने के लिए तख्ते और रोक के लिए दोनों तरफ बाजू थे।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eपन्ना ने आश्चर्य से पूछा- ये गाड़ियाँ किसने बनायी?\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eकेदार ने चिढ़कर कहा- रग्घू दादा ने बनायी हैं, और किसने! भगत के घर से बसूला और रुखानी माँग लाए और चटपट बना दी। खूब दौड़ती हैं काकी! बैठ खुन्नू मैं खींचूँ।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eखुन्नू गाड़ी में बैठ गया। केदार खींचने लगा। चर-चर शोर हुआ मानो गाड़ी भी इस खेल में लड़कों के साथ शरीक है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eलछमन ने दूसरी गाड़ी में बैठकर कहा- दादा, खींचो।\u003c\/p\u003e","brand":"Sai ePublications \u0026 Sai Shop","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47078570393840,"sku":"2940046152951","price":2.99,"currency_code":"USD","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0737\/7593\/9824\/files\/2940046152951_p1.jpg?v=1763983805","url":"https:\/\/shop-qa.barnesandnoble.com\/products\/2940046152951","provider":"Barnes \u0026 Noble (DEV)","version":"1.0","type":"link"}