{"product_id":"2940046201192","title":"Mansarovar - Part 8 (Hindi)","description":"\u003cp\u003eमानसरोवर - भाग 8\u003cbr\u003eखून सफेद\u003cbr\u003eगरीब की हाय\u003cbr\u003eबेटी का धन\u003cbr\u003eधर्मसंकट\u003cbr\u003eसेवा-मार्ग\u003cbr\u003eशिकारी राजकुमार\u003cbr\u003eबलिदान\u003cbr\u003eबोध\u003cbr\u003eसच्चाई का उपहार\u003cbr\u003eज्वालामुखी\u003cbr\u003eपशु से मनुष्य\u003cbr\u003eमूठ\u003cbr\u003eब्रह्म का स्वांग\u003cbr\u003eविमाता\u003cbr\u003eबूढ़ी काकी\u003cbr\u003eहार की जीत\u003cbr\u003eदफ्तरी\u003cbr\u003eविध्वंस\u003cbr\u003eस्वत्व-रक्षा\u003cbr\u003eपूर्व-संस्कार\u003cbr\u003eदुस्साहस\u003cbr\u003eबौड़म\u003cbr\u003eगुप्तधन\u003cbr\u003eआदर्श विरोध\u003cbr\u003eविषम समस्या\u003cbr\u003eअनिष्ट शंका\u003cbr\u003eसौत\u003cbr\u003eसज्जनता का दंड\u003cbr\u003eनमक का दारोगा\u003cbr\u003eउपदेश\u003cbr\u003eपरीक्षा\u003cbr\u003e-----------------------------------\u003cbr\u003eजब नमक का नया विभाग बना और ईश्वरप्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से। अधिकारियों के पौ-बारह थे। पटवारीगिरी का सर्वसम्मानित पद छोड-छोडकर लोग इस विभाग की बरकंदाजी करते थे। इसके दारोगा पद के लिए तो वकीलों का भी जी ललचाता था।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eयह वह समय था जब ऍंगरेजी शिक्षा और ईसाई मत को लोग एक ही वस्तु समझते थे। फारसी का प्राबल्य था। प्रेम की कथाएँ और शृंगार रस के काव्य पढकर फारसीदाँ लोग सर्वोच्च पदों पर नियुक्त हो जाया करते थे।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eमुंशी वंशीधर भी जुलेखा की विरह-कथा समाप्त करके सीरी और फरहाद के प्रेम-वृत्तांत को नल और नील की लडाई और अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्व की बातें समझते हुए रोजगार की खोज में निकले।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eउनके पिता एक अनुभवी पुरुष थे। समझाने लगे, 'बेटा! घर की दुर्दशा देख रहे हो। ॠण के बोझ से दबे हुए हैं। लडकियाँ हैं, वे घास-फूस की तरह बढती चली जाती हैं। मैं कगारे पर का वृक्ष हो रहा हूँ, न मालूम कब गिर पडूँ! अब तुम्हीं घर के मालिक-मुख्तार हो।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e'नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृध्दि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती हैं, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e'इस विषय में विवेक की बडी आवश्यकता है। मनुष्य को देखो, उसकी आवश्यकता को देखो और अवसर को देखो, उसके उपरांत जो उचित समझो, करो। गरजवाले आदमी के साथ कठोरता करने में लाभ ही लाभ है। लेकिन बेगरज को दाँव पर पाना जरा कठिन है। इन बातों को निगाह में बाँध लो यह मेरी जन्म भर की कमाई है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eइस उपदेश के बाद पिताजी ने आशीर्वाद दिया। वंशीधर आज्ञाकारी पुत्र थे। ये बातें ध्यान से सुनीं और तब घर से चल खडे हुए। इस विस्तृत संसार में उनके लिए धैर्य अपना मित्र, बुध्दि अपनी पथप्रदर्शक और आत्मावलम्बन ही अपना सहायक था। लेकिन अच्छे शकुन से चले थे, जाते ही जाते नमक विभाग के दारोगा पद पर प्रतिष्ठित हो गए। वेतन अच्छा और ऊपरी आय का तो ठिकाना ही न था। वृध्द मुंशीजी को सुख-संवाद मिला तो फूले न समाए। महाजन कुछ नरम पडे, कलवार की आशालता लहलहाई। पडोसियों के हृदय में शूल उठने लगे।\u003c\/p\u003e","brand":"Sai ePublications \u0026 Sai Shop","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47110793265392,"sku":"2940046201192","price":2.99,"currency_code":"USD","in_stock":true}],"url":"https:\/\/shop-qa.barnesandnoble.com\/products\/2940046201192","provider":"Barnes \u0026 Noble (DEV)","version":"1.0","type":"link"}