{"product_id":"9781329908420","title":"Mansarovar - Part 6 (???????? - ??? 6)","description":"\u003cp\u003eमानसरोवर - भाग 6 \u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eयह मेरी मातृभूमि है\u003cbr\u003e राजा हरदौल \u003cbr\u003eत्यागी का प्रेम \u003cbr\u003eरानी सारन्धा \u003cbr\u003eशाप \u003cbr\u003eमर्यादा की वेदी \u003cbr\u003eमृत्यु के पीछे \u003cbr\u003eपाप का अग्निकुंड \u003cbr\u003eआभूषण \u003cbr\u003eजुगनू की चमक \u003cbr\u003eगृह-दाह \u003cbr\u003eधोखा \u003cbr\u003eलाग-डाट \u003cbr\u003eअमावस्या की रात्रि \u003cbr\u003eचकमा \u003cbr\u003eपछतावा \u003cbr\u003eआप-बीती \u003cbr\u003eराज्य-भक्त \u003cbr\u003eअधिकार-चिन्ता \u003cbr\u003eदुराशा (प्रहसन) \u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003e-------------------------- \u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eआज पूरे 60 वर्ष के बाद मुझे मातृभूमि-प्यारी मातृभूमि के दर्शन प्राप्त हुए हैं। जिस समय मैं अपने प्यारे देश से विदा हुआ था और भाग्य मुझे पश्चिम की ओर ले चला था उस समय मैं पूर्ण युवा था। मेरी नसों में नवीन रक्त संचारित हो रहा था। हृदय उमंगों और बड़ी-बड़ी आशाओं से भरा हुआ था। मुझे अपने प्यारे भारतवर्ष से किसी अत्याचारी के अत्याचार या न्याय के बलवान हाथों ने नहीं जुदा किया था। अत्याचारी के अत्याचार और कानून की कठोरताएँ मुझसे जो चाहे सो करा सकती हैं मगर मेरी प्यारी मातृभूमि मुझसे नहीं छुड़ा सकतीं। वे मेरी उच्च अभिलाषाएँ और बड़े-बड़े ऊँचे विचार ही थे जिन्होंने मुझे देश-निकाला दिया था। मैंने अमेरिका जा कर वहाँ खूब व्यापार किया और व्यापार से धन भी खूब पैदा किया तथा धन से आनंद भी खूब मनमाने लूटे। सौभाग्य से पत्नी भी ऐसी मिली जो सौंदर्य में अपना सानी आप ही थी। उसकी लावण्यता और सुन्दरता की ख्याति तमाम अमेरिका में फैली। उसके हृदय में ऐसे विचार की गुंजाइश भी न थी जिसका सम्बन्ध मुझसे न हो मैं उस पर तन-मन से आसक्त था और वह मेरी सर्वस्व थी। मेरे पाँच पुत्र थे जो सुन्दर हृष्ट-पुष्ट और ईमानदार थे। उन्होंने व्यापार को और भी चमका दिया था। मेरे भोले-भाले नन्हे-नन्हे पौत्र गोद में बैठे हुए थे जब कि मैंने प्यारी मातृभूमि के अंतिम दर्शन करने को अपने पैर उठाये। मैंने अनंत धन प्रियतमा पत्नी सपूत बेटे और प्यारे-प्यारे जिगर के टुकड़े नन्हे-नन्हे बच्चे आदि अमूल्य पदार्थ केवल इसीलिए परित्याग कर दिया कि मैं प्यारी भारत-जननी का अंतिम दर्शन कर लूँ। मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूँ दस वर्ष के बाद पूरे सौ वर्ष का हो जाऊँगा। अब मेरे हृदय में केवल एक ही अभिलाषा बाकी है कि मैं अपनी मातृभूमि का रजकण बनूँ।\u003c\/p\u003e","brand":"Sai ePublications","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47137205616880,"sku":"9781329908420","price":2.99,"currency_code":"USD","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0737\/7593\/9824\/files\/9781329908420_p0.jpg?v=1763708257","url":"https:\/\/shop-qa.barnesandnoble.com\/products\/9781329908420","provider":"Barnes \u0026 Noble (DEV)","version":"1.0","type":"link"}