{"product_id":"9781329908437","title":"Mansarovar - Part 7 (???????? - ??? 7)","description":"\u003cp\u003eमानसरोवर - भाग 7 \u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eजेल \u003cbr\u003eपत्नी से पति \u003cbr\u003eशराब की दुकान \u003cbr\u003eजुलूस \u003cbr\u003eमैकू \u003cbr\u003eसमर-यात्रा \u003cbr\u003eशान्ति \u003cbr\u003eबैंक का दिवाला \u003cbr\u003eआत्माराम \u003cbr\u003eदुर्गा का मन्दिर \u003cbr\u003eबड़े घर की बेटी \u003cbr\u003eपंच-परमेश्वर \u003cbr\u003eशंखनाद \u003cbr\u003eजिहाद \u003cbr\u003eफातिहा\u003cbr\u003e वैर का अंत \u003cbr\u003eदो भाई \u003cbr\u003eमहातीर्थ \u003cbr\u003eविस्मृति\u003cbr\u003e प्रारब्ध \u003cbr\u003eसुहाग की साड़ी\u003cbr\u003e लोकमत का सम्मान\u003cbr\u003e नाग-पूजा \u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003e---------------------------------- \u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eमृदुला मैजिस्ट्रेट के इजलास से ज़नाने जेल में वापस आयी, तो उसका मुख प्रसन्न था। बरी हो जाने की गुलाबी आशा उसके कपोलों पर चमक रही थी। उसे देखते ही राजनैतिक कैदियों के एक गिरोह ने घेर लिया और पूछने लगीं, कितने दिन की हुई ? मृदुला ने विजय-गर्व से कहा-मैंने तो साफ-साफ कह दिया, मैंने धरना नहीं दिया। यों आप जबर्दस्त हैं, जो फैसला चाहें, करें। न मैंने किसी को रोका, न पकड़ा, न धक्का दिया, न किसी से आरजू-मिन्नत ही की। कोई ग्राहक मेरे सामने आया ही नहीं। हाँ, मैं दूकान पर खड़ी ज़रूर थी। वहाँ कई वालंटियर गिरफ्तार हो गये थे। जनता जमा हो गयी थी। मैं भी खड़ी हो गयी। बस, थानेदार ने आ कर मुझे पकड़ लिया। क्षमादेवी कुछ कानून जानती थीं। बोलीं-मैजिस्ट्रेट पुलिस के बयान पर फैसला करेगा। मैं ऐसे कितने ही मुकदमे देख चुकी। मृदुला ने प्रतिवाद किया-पुलिसवालों को मैंने ऐसा रगड़ा कि वह भी याद करेंगे। मैं मुकदमे की कार्रवाई में भाग न लेना चाहती थी; लेकिन जब मैंने उनके गवाहों को सरासर झूठ बोलते देखा, तो मुझसे ज़ब्त न हो सका। मैंने उनसे जिरह करनी शुरू की। मैंने भी इतने दिनों घास नहीं खोदी है। थोड़ा-सा कानून जानती हूँ। पुलिस ने समझा होगा, यह कुछ बोलेगी तो है नहीं, हम जो बयान चाहेंगे, देंगे। जब मैंने जिरह शुरू की, तो सब बगलें झाँकने लगे। मैंने तीनों गवाहों को झूठा साबित कर दिया। उस समय जाने कैसे मुझे चोट सूझती गयी। मैजिस्ट्रेट ने थानेदार को दो-तीन बार फटकार भी बतायी। वह मेरे प्रश्नों का ऊल-जलूल जवाब देता था, तो मैजिस्ट्रेट बोल उठता था-वह जो कुछ पूछती हैं, उसका जवाब दो, फजूल की बातें क्यों करते हो। तब मियाँ जी का मुँह जरा-सा निकल आता था। मैंने सबों का मुँह बंद कर दिया। अभी साहब ने फैसला तो नहीं सुनाया, लेकिन मुझे विश्वास है, बरी हो जाऊँगी । मैं जेल से नहीं डरती; लेकिन बेवकूफ भी नहीं बनना चाहती । वहाँ हमारे मंत्री जी भी थे और बहुत-सी बहनें थीं। सब यही कहती थीं, तुम छूट जाओगी।\u003c\/p\u003e","brand":"Sai ePublications","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47137188086000,"sku":"9781329908437","price":2.99,"currency_code":"USD","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0737\/7593\/9824\/files\/9781329908437_p0.jpg?v=1763708800","url":"https:\/\/shop-qa.barnesandnoble.com\/products\/9781329908437","provider":"Barnes \u0026 Noble (DEV)","version":"1.0","type":"link"}