{"product_id":"9781329908444","title":"Mansarovar - Part 8 (???????? - ??? 8)","description":"\u003cp\u003eमानसरोवर - भाग 8 \u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eखून सफेद \u003cbr\u003eगरीब की हाय \u003cbr\u003eबेटी का धन \u003cbr\u003eधर्मसंकट\u003cbr\u003e सेवा-मार्ग\u003cbr\u003e शिकारी \u003cbr\u003eराजकुमार\u003cbr\u003e बलिदान\u003cbr\u003e बोध\u003cbr\u003e सच्चाई का उपहार \u003cbr\u003eज्वालामुखी \u003cbr\u003eपशु से मनुष्य \u003cbr\u003eमूठ \u003cbr\u003eब्रह्म का स्वांग \u003cbr\u003eविमाता \u003cbr\u003eबूढ़ी काकी \u003cbr\u003eहार की जीत \u003cbr\u003eदफ्तरी\u003cbr\u003e विध्वंस \u003cbr\u003eस्वत्व-रक्षा \u003cbr\u003eपूर्व-संस्कार\u003cbr\u003e दुस्साहस\u003cbr\u003e बौड़म \u003cbr\u003eगुप्तधन\u003cbr\u003e आदर्श\u003cbr\u003e विरोध\u003cbr\u003e विषम समस्या \u003cbr\u003eअनिष्ट \u003cbr\u003eशंका \u003cbr\u003eसौत \u003cbr\u003eसज्जनता का दंड\u003cbr\u003e नमक का दारोगा \u003cbr\u003eउपदेश \u003cbr\u003eपरीक्षा \u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003e----------------------------------- \u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eजब नमक का नया विभाग बना और ईश्वरप्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से। अधिकारियों के पौ-बारह थे। पटवारीगिरी का सर्वसम्मानित पद छोड-छोडकर लोग इस विभाग की बरकंदाजी करते थे। इसके दारोगा पद के लिए तो वकीलों का भी जी ललचाता था। यह वह समय था जब ऍंगरेजी शिक्षा और ईसाई मत को लोग एक ही वस्तु समझते थे। फारसी का प्राबल्य था। प्रेम की कथाएँ और शृंगार रस के काव्य पढकर फारसीदाँ लोग सर्वोच्च पदों पर नियुक्त हो जाया करते थे। मुंशी वंशीधर भी जुलेखा की विरह-कथा समाप्त करके सीरी और फरहाद के प्रेम-वृत्तांत को नल और नील की लडाई और अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्व की बातें समझते हुए रोजगार की खोज में निकले। उनके पिता एक अनुभवी पुरुष थे। समझाने लगे, 'बेटा! घर की दुर्दशा देख रहे हो। ॠण के बोझ से दबे हुए हैं। लडकियाँ हैं, वे घास-फूस की तरह बढती चली जाती हैं। मैं कगारे पर का वृक्ष हो रहा हूँ, न मालूम कब गिर पडूँ! अब तुम्हीं घर के मालिक-मुख्तार हो। 'नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृध्दि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती हैं, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ।\u003c\/p\u003e","brand":"Sai ePublications","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47137132577008,"sku":"9781329908444","price":2.99,"currency_code":"USD","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0737\/7593\/9824\/files\/9781329908444_p0.jpg?v=1763708029","url":"https:\/\/shop-qa.barnesandnoble.com\/products\/9781329908444","provider":"Barnes \u0026 Noble (DEV)","version":"1.0","type":"link"}