{"product_id":"9781365632235","title":"Meghdoot","description":"\u003cp\u003e\u003cb\u003eमेघदूतम्\u003c\/b\u003e महाकवि कालिदास द्वारा रचित विख्यात दूतकाव्य है। इसमें एक यक्ष की कथा है जिसे कुबेर अलकापुरी से निष्कासित कर देता है। निष्कासित यक्ष रामगिरि पर्वत पर निवास करता है। वर्षा ऋतु में उसे अपनी प्रेमिका की याद सताने लगती है। कामार्त यक्ष सोचता है कि किसी भी तरह से उसका अल्कापुरी लौटना संभव नहीं है, इसलिए वह प्रेमिका तक अपना संदेश दूत के माध्यम से भेजने का निश्चय करता है। अकेलेपन का जीवन गुजार रहे यक्ष को कोई संदेशवाहक भी नहीं मिलता है, इसलिए उसने मेघ के माध्यम से अपना संदेश विरहाकुल प्रेमिका तक भेजने की बात सोची। इस प्रकार आषाढ़ के प्रथम दिन आकाश पर उमड़ते मेघों ने कालिदास की कल्पना के साथ मिलकर एक अनन्य कृति की रचना कर दी।\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eमेघदूतम् काव्य दो खंडों में विभक्त है। \u003cb\u003eपूर्वमेघ\u003c\/b\u003e में यक्ष बादल को रामगिरि से अलकापुरी तक के रास्ते का विवरण देता है और \u003cb\u003eउत्तरमेघ\u003c\/b\u003e में यक्ष का यह प्रसिद्ध विरहदग्ध संदेश है जिसमें कालिदास ने प्रेमीहृदय की भावना को उड़ेल दिया है।\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003e------------------------\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003e\u003cb\u003eपूर्वमेघ\u003c\/b\u003e\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003e1\u003cbr\u003eकश्चित्‍कान्‍ताविरहगुरुणा स्‍वाधिकारात्‍प्रमत:\u003cbr\u003e शापेनास्‍तग्‍ड:मितमहिमा वर्षभोग्‍येण भर्तु:।\u003cbr\u003eयक्षश्‍चक्रे जनकतनयास्‍नानपुण्‍योदकेषु\u003cbr\u003e स्निग्‍धच्‍छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।।\u003cbr\u003eकोई यक्ष था। वह अपने काम में असावधान\u003cbr\u003eहुआ तो यक्षपति ने उसे शाप दिया कि\u003cbr\u003eवर्ष-भर पत्‍नी का भारी विरह सहो। इससे\u003cbr\u003eउसकी महिमा ढल गई। उसने रामगिरि के\u003cbr\u003eआश्रमों में बस्‍ती बनाई जहाँ घने छायादार\u003cbr\u003eपेड़ थे और जहाँ सीता जी के स्‍नानों द्वारा\u003cbr\u003eपवित्र हुए जल-कुंड भरे थे।\u003cbr\u003e 2\u003cbr\u003eतस्मिन्‍नद्रो कतिचिदबलाविप्रयुक्‍त: स कामी\u003cbr\u003e नीत्‍वा मासान्‍कनकवलयभ्रंशरिक्‍त प्रकोष्‍ठ:\u003cbr\u003eआषाढस्‍य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्‍टसानु\u003cbr\u003e वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।\u003cbr\u003eस्‍त्री के विछोह में कामी यक्ष ने उस पर्वत\u003cbr\u003eपर कई मास बिता दिए। उसकी कलाई\u003cbr\u003eसुनहले कंगन के खिसक जाने से सूनी\u003cbr\u003eदीखने लगी। आषाढ़ मास के पहले दिन पहाड़ की\u003cbr\u003eचोटी पर झुके हुए मेघ को उसने देखा तो\u003cbr\u003eऐसा जान पड़ा जैसे ढूसा मारने में मगन\u003cbr\u003eकोई हाथी हो।\u003c\/p\u003e","brand":"Sai ePublications","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47137471856880,"sku":"9781365632235","price":0.99,"currency_code":"USD","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0737\/7593\/9824\/files\/9781365632235_p0.jpg?v=1763711353","url":"https:\/\/shop-qa.barnesandnoble.com\/products\/9781365632235","provider":"Barnes \u0026 Noble (DEV)","version":"1.0","type":"link"}