{"product_id":"9781618132130","title":"Ramcharitmanas","description":"\u003cp\u003eवर्णानामर्थसंघानां रसानां छंदसामपि।\u003cbr\u003eमंगलानां च कर्त्तारौ वंदे वाणीविनायकौ॥ 1॥\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eअक्षरों, अर्थ समूहों, रसों, छंदों और मंगलों की कर्त्री सरस्वती और गणेश की मैं वंदना करता हूँ॥ 1॥\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eभवानीशंकरौ वंदे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।\u003cbr\u003eयाभ्यां विना न पश्यंति सिद्धाः स्वांत:स्थमीश्वरम्‌॥ 2॥\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eश्रद्धा और विश्वास के स्वरूप पार्वती और शंकर की मैं वंदना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अंत:करण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते॥ 2॥\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eवंदे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्‌।\u003cbr\u003eयमाश्रितो हि वक्रोऽपि चंद्र: सर्वत्र वंद्यते॥ 3॥\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eज्ञानमय, नित्य, शंकररूपी गुरु की मैं वंदना करता हूँ, जिनके आश्रित होने से ही टेढ़ा चंद्रमा भी सर्वत्र होता है॥ 3॥\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eसीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।\u003cbr\u003eवंदे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥ 4॥\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eसीताराम के गुणसमूहरूपी पवित्र वन में विहार करनेवाले, विशुद्ध विज्ञान संपन्न कवीश्वर वाल्मीकि और कपीश्वर हनुमान की मैं वंदना करता हूँ॥ 4॥\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eउद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्‌।\u003cbr\u003eसर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्‌॥ 5॥\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eउत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार करनेवाली, क्लेशों को हरनेवाली तथा संपूर्ण कल्याणों को करनेवाली राम की प्रियतमा सीता को मैं नमस्कार करता हूँ॥ 5॥\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eयन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा\u003cbr\u003eयत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।\u003cbr\u003eयत्पादप्लवमेकमेव हि भवांभोधेस्तितीर्षावतां\u003cbr\u003eवंदेऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्‌॥ 6॥\u003c\/p\u003e\u003cbr\u003e \u003cp\u003eजिनकी माया के वशीभूत संपूर्ण विश्व, ब्रह्मादि देवता और असुर हैं, जिनकी सत्ता से रस्सी में सर्प के भ्रम की भाँति यह सारा दृश्य जगत सत्य ही प्रतीत होता है और जिनके केवल चरण ही भवसागर से तरने की इच्छा वालों के लिए एकमात्र नौका हैं, उन समस्त कारणों से परे राम कहानेवाले भगवान हरि की मैं वंदना करता हूँ॥ 6॥ \u003c\/p\u003e","brand":"Sai ePublications","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47148567920880,"sku":"9781618132130","price":2.99,"currency_code":"USD","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0737\/7593\/9824\/files\/9781618132130_p0.jpg?v=1763855011","url":"https:\/\/shop-qa.barnesandnoble.com\/products\/9781618132130","provider":"Barnes \u0026 Noble (DEV)","version":"1.0","type":"link"}