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Sushil Jain

kaisi ho ciriya?

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वर्तमान में मानव-समाज जिस सांस्कृतिक और पारिस्थित्कीय संकट से गुजर रहा है वह अभूतपूर्व है। हमारे चारों और बढती व्यावसायिकता ने परिस्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। प्रस्तुत काव्य-संग्रह में 'चिड़िया' के रूपक के माध्यम से समकालीन मानव-समाज की इन्हीं विसंगतियों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।

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